Home सिवनीं न्यूज़ रजनीश के हाथों से रेत की तरह फिसलती राजनीति

रजनीश के हाथों से रेत की तरह फिसलती राजनीति

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रजनीश के हाथों से रेत की तरह फिसलती राजनीति

ढोलक की ताल पर नाचने और जनता का मनोरंजन करने को ही विकास समझ रहे थे रजनीश ,राकेश ने तोड़ा था भ्रम

जनता का मनोरंजन करने जॉनी लीवर बने रजनीश सिंह कभी अहिरी नृत्य, तो कभी शैला,तो कभी  मेलों में नाच कर, रामलीला में किरदार निभाकर लोगों का मनोरंजन करने में मस्त रहे और विधानसभा सीट राकेश पाल उड़ा कर ले गए ,अति आत्मविश्वास और जनता को अपनी बपौती समझते हुए कार्यकर्ताओं को बंधुआ मजदूर की तर्ज पर इस्तेमाल करने वाले रजनीश सिंह यह भूल गए कि केवलारी सीट समझौते की सीट रही है रजनीश की निष्क्रियता के कारण 25 साल का कांग्रेसी किला तोड़कर राकेश पाल ने केवलारी सीट जीत लिया था, जबकि स्वर्गीय ठाकुर हरवंश सिंह के बारे में माना जाता था की वे चाणक्य राजनीति के ज्ञाता  थे, और राजनीति में सुविधा के मुताबिक मैनेजमेंट करना उन्हें बहुत अच्छे से आता था, इस बात में दो राय नहीं है कि माननीय स्वर्गीय ठाकुर हरवंश सिंह कुशाग्र बुद्धि के धनी और कुशल राजनीति के ज्ञाता थे और उन्होंने इसका परिचय देते हुए केवलारी सीट पर राज करते हुए मंत्री भी बने, बताया जाता है कि केवलारी विधानसभा मैनेजमेंट की विधानसभा  सीट है ,जिसे स्व.ठाकुर साहब भलीभांति समझते थे ,हकीकत में केवलारी कांग्रेस की सीट है ही नहीं, स्व.ठाकुर हरवंश सिंह हमेशा अपनी सीट बचाने के लिए समझौता और सौदा करते थे, तभी तो हर बार चुनाव में ठाकुर साहब ज्यादा लीड लेकर कभी चुनाव नहीं जीते है, स्वर्गीय हरवंश सिंह के जाने के बाद क्षेत्र की जनता को लगा रजनीश सिंह ठाकुर साहब की जगह तो नहीं ले सकते कम से कम उनके पुत्र होने का अहसास तो करवाएंगे,परंतु छेत्र की जनता का भरोसा रजनीश पर से उस वक्त उठ गया जब स्वर्गीय हरवंश सिंह जी की  मैनेजमेंट वाली सीट भी नही संभाल पाए और चुनाव राकेश पाल सिंह से हार गए,छेत्र के राजनीति के जानकार बताते है की रजनीश सिंह  को पुन टिकट मिलती भी है तो केवलारी विधानसभा सीट पर रजनीश की  वापसी  संभव नहीं है ,परंतु रजनीश सिंह  अभी भी भ्रम पाले हुए हैं की चुनाव जीत जाएंगे,उन्हें कौन बताए कि अपने आका को जूते पहनाना अलग बात है, और जनता के दिल मे उतरना अलग बात ,यहां तो मामला ही उल्टा है यहां रजनीश की निष्क्रियता के कारण जनता के दिल से उतर गए है, क्षेत्र की जनता यह कहती नजर आ रही है की 5 सालों में विपक्ष की राजनीति को लेकर कोई बड़ा जन आंदोलन जनता के लिए ठाकुर रजनीश सिंह ने नहीं किया है ,बल्कि चुनाव करीब आते ही ठाकुर रजनीश सिंह जनता के बीच आकर सुध लेने का ढोंग कर रहे है,जिसकी फोटो सोशल मीडिया पर डालकर राजनीति चमका रहे हैं ,पर जनता के दुख में कभी भी विपक्ष की भूमिका निभाते हुए आंदोलन नहीं करें हैं जो रजनीश सिंह के लिए बड़ी हार की वजह बन सकती है।

रजनीश का वर्चस्व नही बचा है जिसका उदहारण है कि छपारा नगर परिषद चुनाव में अपने प्रत्याशी भी नहीं जिता पाए थे 

रजनीश सिंह का वर्चस्व यहीं से पता चलता है कि 5 साल निष्क्रिय राजनीति करने के बाद निकाय चुनाव में अपने ददियालऔर ननिहाल गांव  और उसके आसपास गाँव से जो प्रत्याशी खड़े किए गए थे जिन पर रजनीश सिंह का हाथ था पर उन्हें भी रजनीश सिंह नहीं जीता पाए थे ,इससे शर्मनाक बात क्या होगी कि जिस क्षेत्र में रजनीश का बचपन गुजरा है ठाकुर साहब ने सारी उम्र राजनीति की है उसे क्षेत्र में रजनीश सिंह अपने प्रत्याशियों को भी नहीं जीता सक रहे हैं हम बात करें छपारा के नगर परिषद चुनाव की जहां पहली बार नगर परिषद का चुनाव हुआ, ढोल ,बाजे और नगाड़े के साथ 15 वार्ड के 15 अधिकृत कांग्रेस प्रत्याशियों को रजनीश सिंह ने एक साथ रैली के रूप में लाव लश्कर छपारा नगर को दिखाते हुए फार्म डलवाए ,परंतु रजनीश सिंह की निष्क्रियता और रजनीश को जनता स्वीकार न करने  की वजह से केवल 3 प्रत्याशी ही जीत पाए ,गौर करने वाली बात यह है कि यह तीनो के तीनो प्रत्याशी खुद की छवि के कारण इस चुनाव को जीत पाए थे ,क्योंकि वह समाजसेवी और कर्मठ थे ,जिन्होंने खुद की मेहनत से चुनाव जीते हैं जिसमें से एक तो छपारा नगर के पंच और सरपंच भी रह चुके थे, तो लाजमी था कि उनकी पकड़ अच्छी रही होगी और उन्होंने इस चुनाव को जीत लिया इन तीनों प्रत्याशियों के चुनाव जीतने में  रजनीश सिंह का कहीं से कहीं तक कोई लेना-देना नहीं था, जबकि इस चुनाव में निर्दलीय 5 पार्षद चुनाव जीते थे और भाजपा के 7 पार्षद चुनाव जीते थे ,इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि 15 वार्ड में लगभग आधे वार्ड 5 पार्षद निर्दलीय चुनाव जीतकर आ रहे हैं तो कांग्रेस की बखत छपारा में कितनी होगी? जबकि छपारा रजनीश सिंह का ग्रह गांव हैं ,छपारा क्षेत्र रजनीश सिंह का ननिहाल है ,व्यापार, खेती ,रजनीश सिंह की छपारा क्षेत्र में हैं, बावजूद इसके छपारा से 15 प्रत्याशी खड़ा कर केवल 3 प्रत्याशी चुनाव जीते हैं, वह भी खुद के दम पर , तो ये माना जा सकता है कि रजनीश की लोकप्रियता कम हो गई है और ऐसे में केवलारी का चुनाव रजनीश के लिए आसान नही।

कौनसा समझौता किये जो उपाध्यक्ष भी नही बना पाए?

नगर परिषद छपारा में भाजपा ने निर्विरोध अपना अध्यक्ष बना लिया था ,क्योंकि कांग्रेस ने अपना कोई भी प्रत्याशी खड़ा नहीं किया था ,जबकि भाजपा के पास भी बहुमत नहीं था और भाजपा ने समर्थन लेकर अपना अध्यक्ष बनाया है तो फिर रजनीश सिंह के पास 3 पार्षद थे और 5 पार्षद निर्दलीय चुनाव जीत कर आए थे तो रजनीश सिंह ने सामंजस बनाते हुए अपना प्रत्याशी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के लिए खड़ा क्यों नहीं किया ?

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