स्वर्गीय ठाकुर हरवंश सिंह के बारे में यह बात कही जाती है कि वे कद्दावर नेता थे, और राजनीति में मैनेजमेंट करना उन्हें बहुत अच्छे से आता था, इस बात में दो राय नहीं है कि स्वर्गीय ठाकुर हरवंश सिंह कुशाग्र बुद्धि के धनी और कुशल राजनीति के ज्ञाता थे और उन्होंने इसका परिचय देते हुए केवलारी सीट से राज भी किया ,बताया जाता है कि केवलारी विधानसभा सीट ठाकुर साहब के रहते मैनेजमेंट की सीट रही है हकीकत में केवलारी कांग्रेस की सीट है ही नहीं, ठाकुर हरवंश सिंह हमेशा अपनी सीट बचाने के लिए समझौता और सौदा करते थे, तभी तो हर बार चुनाव में ठाकुर साहब ज्यादा लीड लेकर कभी चुनाव नहीं जीते है, ठाकुर साहब का अचानक चले जाने से सिवनी जिले को बड़ा नुकसान हुआ, क्योंकि सिवनी जिले में स्वर्गीय हरवंश सिंह जैसे कद्दावर नेता नहीं थे,क्षेत्र की जनता को लगा उनके पुत्र रजनीश सिंह ठाकुर साहब की जगह तो नहीं ले सकते कम से कम उनके पद चिन्हों पर चलेंगे परंतु छेत्र की जनता का भरोसा उस वक्त टूट गया जब स्वर्गीय हरवंश सिंह जी की मैनेजमेंट सीट केवलारी का चुनाव रजनीश सिंह हार गए ,बताया जाता है की अब रजनीश सिंह पुन टिकट मिलती भी है तो केवलारी विधानसभा सीट पर वापसी संभव नहीं है ,परंतु रजनीश सिंह भ्रम जरूर पाले हुए हैं की चुनाव जीत जाएंगे ,जबकि क्षेत्र की जनता यह कहती नजर आ रही है 5 सालों में विपक्ष की राजनीति को लेकर कोई बड़ा जन आंदोलन जनता के लिए ठाकुर रजनीश सिंह ने नहीं किया है ,बल्कि चुनाव करीब आते ही ठाकुर रजनीश सिंह बारसा ,कथा,पूजा, कबड्डी, शादी, तेरहवीं में जाकर कार्यक्रम की फोटो सोशल मीडिया पर डालकर राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहे हैं पर जनता के दुख में कभी भी विपक्ष की भूमिका निभाते हुए आंदोलन नहीं करें हैं जो रजनीश सिंह के लिए बड़ी हार की वजह बनेगी।
छपारा नगर परिषद चुनाव में ही अपने प्रत्याशी नहीं जिता पाए थे रजनीश
खुद के घर के बल्ब फ्यूज पड़े हैं और दूसरों के घर के बल बदलने वाली कहावत रजनीश सिंह पर फिट बैठ रही है हम बात करें छपारा के नगर परिषद चुनाव की जहां पहली बार नगर परिषद का चुनाव हुआ, ढोल ,बाजे और नगाड़े के साथ 15 वार्ड के 15 अधिकृत कांग्रेस प्रत्याशियों को रजनीश सिंह ने एक साथ रैली के रूप में लाव लश्कर छपारा नगर को दिखाते हुए फार्म डलवाए ,परंतु रजनीश सिंह की निष्क्रियता और लोकप्रियता नहीं होने की वजह से केवल 3 प्रत्याशी ही जीत पाए ,गौर करने वाली बात यह है कि यह तीनो के तीनो प्रत्याशी खुद की छवि के कारण इस चुनाव को जीत पाए हैं ,क्योंकि वह समाजसेवी और कर्मठ थे ,जिन्होंने खुद की मेहनत से चुनाव जीते हैं जिसमें से एक तो छपारा नगर के पंच और सरपंच भी रह चुके है, तो लाजमी था कि उनकी पकड़ अच्छी रही और उन्होंने इस चुनाव को जीत लिया इन तीनों प्रत्याशियों के चुनाव जीतने में रजनीश सिंह का कहीं से कहीं तक कोई लेना-देना नहीं था, जबकि इस चुनाव में निर्दलीय 7 पार्षद चुनाव जीते थे और भाजपा के 6 पार्षद चुनाव जीते थे ,इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि 15 वार्ड में लगभग आधे वार्ड 7 पार्षद निर्दलीय चुनाव जीतकर आ रहे हैं तो कांग्रेस की बखत छपारा में कितनी होगी? जबकि छपारा रजनीश सिंह का ग्रह गांव हैं ,छपारा क्षेत्र रजनीश सिंह का ननिहाल है ,व्यापार, खेती ,रजनीश सिंह की छपारा क्षेत्र में हैं, बावजूद इसके छपारा से 15 प्रत्याशी खड़ा कर केवल 3 प्रत्याशी चुनाव जीते हैं, वह भी खुद के दम पर , तो वही बात हुई ना कि छपारा के बल्ब फ्यूज पड़े हैं और रजनीश केवलारी के बल्ब बदलने की बात कर रहे हैं।
आखिर उपाध्यक्ष के लिए रजनीश ने क्यों नहीं भरा दम?
नगर परिषद छपारा में भाजपा ने निर्विरोध अपना अध्यक्ष बना लिया था ,क्योंकि कांग्रेस ने अपना कोई भी प्रत्याशी खड़ा नहीं किया था ,जबकि भाजपा के पास भी बहुमत नहीं था और भाजपा ने समर्थन लेकर अपना अध्यक्ष बनाया है तो फिर रजनीश सिंह के पास 3 पार्षद थे और साथ पार्षद निर्दलीय चुनाव जीत कर आए थे तो रजनीश सिंह ने सामंजस बनाते हुए अपना प्रत्याशी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के लिए खड़ा क्यों नहीं किया ?