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फर्जी पत्रकारों पर संज्ञान क्यों नहीं ले रहा प्रसाशन

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आए दिन विवाद की स्थिति पैदा कर रहे फर्जी पत्रकार

चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकार को अब लोग हास्य की दृष्टि से देखने लगे हैं ,वाकई जो लोग पत्रकारिता कर रहे हैं अपना अखबार निकाल रहे हैं, सेटेलाइट चैनल छेत्र प्रमुख और जिम्मेदार हैं ,भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक कार्यालय एवं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से पंजीकृत हैं, जिनके समाचार अवधी अनुसार प्रकाशित और प्रसारित हो रहे हैं उन्हें छोड़ दिया जाए तो लगभग जिले में पत्रकारों का झुंड कुत्तों की गैंग की तरह नोचने और हड्डी चूसने के लिए घूम रहे हैं। जिसके चलते अब सरकारी योजनाओं को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है सरकारी कर्मचारी तो वैसे ही इन लोगों से परेशान रहते हैं साथ ही आमजन भी अब परेशान होने लगे है, गौर करने वाली बात यह है कि जो लोग वाकई समाचार पत्र निकाल रहे हैं , नियमित निकलने वाले अखबार के प्रमुख हैं और सेटेलाइट में दिखने वाले चैनलों के प्रमुख हैं उन्हें अपने काम से फुर्सत नहीं मिलती है, परंतु जो केवल लूटपाट करने के उद्देश्य से बंद माइक आईडी हाथ में पकड़ कर अपने ही मोबाइल में वीडियो बनाकर, खुश होते हैं क्योंकि सोसल मीडिया में फोकट का मजा लेने का काम करते है ,ऐसे लोग सरकारी कर्मचारी ,अधिकारी और सरकारी योजनाओं के चल रहे काम में अड़ंगा पैदा कर रहे हैं, लूटपाट का सडयंत्र अगर नहीं चल पाता हैं तो अपने आपको पत्रकार बता कर शिकवे शिकायत भी करते हैं और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के द्वारा कहे गए उद्बोधन को लिखकर यह बताते हैं कि पत्रकारों को धमकाने पर 50000 का जुर्माना लगेगा और सजा भी होगी , और यह पूरी बात शायद इन फर्जी लोगों को नहीं पता कि मुख्यमंत्री ने पत्रकारों की बात किया है और पत्रकार की परिभाषा मुख्यमंत्री की नजरों में जो है उसमें वे लोग नहीं आते हैं जो बंद माइक पकड़कर मोबाइल में वीडियो बनाते हैं और किसी प्रकार का कोई पंजीकृत प्लेटफार्म उनके पास नहीं है ऐसे लोग फर्जी पत्रकार की श्रेणी में आते हैं , वाकई पत्रकार कौन हैं इसकी पुष्टि कौन करेगा का सवाल भी इसीलिए खड़ा नहीं होता क्योंकि जिले में जनसंपर्क कार्यालय मौजूद है जहां से लिस्ट निकाली जा सकती है जिन पत्रकारों का नाम वहां अंकित है उस लिस्ट को अगर सार्वजनिक कर दिया जाए तो कुछ हद तक निजात मिल सकती है और ऐसा नहीं हो रहा है इसीलिए कुछ फर्जी इस बात का फायदा उठाते हैं, उन मामले की जानकारी को लेकर सवालिया निशान खड़े करते हैं जिसे कभी समाचार के रूप में प्रकाशित या प्रसारित नही किया है असलियत तो यह है कि नाही इनके पास कलम है, ना इनके पास अखबार है और ना ही इनके पास सेटेलाइट चैनल का कोई आईडी फिर भी धड़ल्ले से प्रशासन की आंख में धूल झोकते हुए मनगढ़ंत खबरें प्रकाशित और प्रसारित कर रहे हैं और लूटपाट कर लोगों को चमका रहे हैं ,ऐसे लोगो की प्रशासन को छटनी करनी चाहिए ,ऐसे फर्जी पत्रकारों को चिन्हित कर उनके ऊपर आपराधिक प्रकरण दर्ज करना चाहिए, जो सरकारी कर्मचारी को चमका रहे हैं ,जो सरकारी योजनाओं को पलीता लगाने के लिए ब्लैक मेलिंग कर रहे हैं ,और यह काम जिला जनसंपर्क अधिकारी और जिला कलेक्टर महोदय को जल्द से जल्द करना चाहिए ताकि उन्हीं के विभाग के कर्मचारी फर्जी पत्रकारों से छुटकारा पा सकें।

700 का माइक ,100 की प्लास्टिक आईडी, 20 का स्टिकर और ब्लैकमेलिंग शुरू

असल पत्रकार को छोड़ दे तो ,जिले में अपने आप को पत्रकार का तमगा लगाकर घूमने वालों की औकात अगर देखें तो उनके पास एक बंद, माइक ,किसी से जुगाड़ की हुई प्लास्टिक की आईडी, जिसमें 20 रु का स्टीकर लगाकर तुरतई चैनल लिखकर मोबाइल से रिकॉर्डिंग करते हैं और अपने आप को बहुत बड़ा पत्रकार बताते हैं ,बिना खर्चे के रुपए कमाने का जरिया पत्रकारिता को बनाकर,असल पत्रकार की छवि भी धूमिल कर रहे है ,साथ ही सरकारी कर्मचारी भी परेशान होते हैं, सिवनी जिले के एक ब्लॉक में घूमकर दो वीडियो बनाते हैं ,शाम को दो घूँट शराब अंदर डालने के बाद सरकार को गिराने की बात इनके मुंह से निकलने लगती है, सुबह से शाम तक किसी अधिकारी कर्मचारी के पीछे पीछे घूम कर 200 रु निकलवा कर दो घूंट दारू पेट में डालने के जुगाड़ में इन ब्लैकमेलरो ने असल पत्रकारों की छवि धूमिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है ,बार-बार समाचार पत्र में हम इस बात का उल्लेख कर रहे हैं कि जल्द से जल्द फर्जी पत्रकारों की छटनी कर उन्हें चिन्हित किया जाए और उनका नाम उजागर किया जाए, परंतु प्रशासन इस मामले को संज्ञान में नहीं ले रहा है जिसके चलते प्रशासन के लोग ही इनके शिकंजे में फंस रहे हैं और ब्लैकमेल हो रहे हैं।

सोशल मीडिया का सहारा लेकर कर रहे ब्लैक मेलिंग

जिले में पत्रकारों की औकात देखना है तो एक बार प्रशासन को कमर कसनी पड़ेगी और चटनी अगर कर लें तो फर्जी पत्रकारों की गैंग का भंडाफोड़ हो जाएगा, दरअसल सोशल मीडिया का उपयोग कर अपने मोबाइल में यूट्यूब चैनल बनाते हुए पत्रकारिता करने का दम भरने वाले इन फर्जी लोगों को प्रशासन ने अपनी भाषा में समझाना चाहिए कि सोशल मीडिया में आजादी जरूर हो सकती है लिखने की परंतु सोशल मीडिया पर समाचार के रूप में किसी भी बात का उल्लेख करना विश्वसनीयता के दायरे में नहीं आता है, विश्वसनीयता समाचार में तभी आएगी जब किसी रजिस्टर्ड प्लेटफार्म पर इस समाचार को प्रकाशित किया जाएगा, जब समाचार में विश्वसनीयता ही नहीं है तो सोशल मीडिया के सहारे ना ही वह विज्ञापन न्यूज़ चैनल के नाम से ले सकता है और ना ही किसी खबरों के नाम से पैसा, सीधे-सीधे कहा जाए तो ब्लैक मेलिंग करने वाला व्यक्ति अपने आप को पत्रकार बताता है जिससे प्रशासन की आंख में मिर्ची डाल रहे है और असल पत्रकारों की छवि भी धूमिल हो रही है परंतु प्रशासन अभी तक इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहा है जिन लोगों ने भारत के पंजीयक कार्यालय में अपना पंजीयन करवा लिया परंतु उसके बाद कई सालों से उनके अखबार का नामोनिशान नहीं है ,वे लोग भी पत्रकार बनकर घूम रहे हैं ,जो अपराध की श्रेणी में आता है ,ऐसे लोगों के ऊपर भी लगाम लगनी चाहिए, कुल मिलाकर जिला कलेक्टर महोदय और जिला जनसंपर्क अधिकारी अगर इस मामले को संज्ञान में लेते हैं तो फर्जी पत्रकारों से जिले को राहत मिल सकती है

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