Home सिवनीं न्यूज़ 3 साल कानून व्यवस्था के बुरे हाल 2

3 साल कानून व्यवस्था के बुरे हाल 2

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3 साल कानून व्यवस्था के बुरे हाल 2

दूसरों को सदाचार का उपदेश,ख़ुद तोड़कर नियम करो श्री गणेश.

दूसरों को सदाचार का उपदेश देकर अपने आपको महान साबित करना बहुत आसान होता है, और थानेदार हर जगह नेकी का उपदेश देने का काम करते देखे गए परंतु उनका उपदेश झूठ इसलिए होता था कि वह खुद नेकी के राह पर नहीं चल पाए, ऐसा उनकी कार्य प्रणाली देखकर पता चलता है, क्योंकि उन्होंने जो आभामंडल बनवाने की कोशिश की वह आभामंडल पूरी तरह खराब हो गया उनके  दलालों के द्वारा उनका जो आभामंडल बनाया गया था वह पूरी तरह टूट चुका है, दलालों ने सिवनीं की जनता के साथ धोखा करते हुए थानेदार का आभामंडल तो बना दिया था ,पर  नुकसान सिवनीं की जनता को भोगना पड़ा है बात करें कोरोना काल की तो कोरोना काल में ऐसा कोई काम थानेदार के द्वारा नहीं किया गया जिसको लेकर उनकी वाहवाही की जाए,जनता के सहयोग से पैसा लेकर खाना बांटने की अगर बात की गई थी तो शहर में ऐसे बहुत से दानी धर्मात्मा लोग जिन्होंने बाहर से आ रहे लोगों को रास्ते में ही रोक कर खाना ,पानी और उनके आवागमन की व्यवस्था अपने खुद के पैसे से की पर उन्होंने कभी ढोल बजाकर यह नहीं बताया कि उन्होंने यह काम किया है, कोरोना कल के समय अखिलेश खेड़ीकर,अशफाक अली डॉन,  नरेंद्र गुड्डू और ऐसे बहुत से भले मानुष,और संगठन जैसे नेकी की राह इन्होंने अपने पैसे से ऑक्सीजन सिलेंडर, दवाइयां, खाने की व्यवस्था ,परिवहन की व्यवस्था, यहां तक की अशफाक अली डॉन ने अपनी एंबुलेंस पूरे कोरोना काल में निशुल्क चलवाई, जब कोरोना का डर दिमाग मे समा चुका था उस वक्त लोगों के प्राण पखेरू उड़े, तो बॉडी को सगा बेटा और परिवार जन हाथ लगाने से डर रहे थे उस वक्त उपरोक्त लोगों ने स्वयं बॉडी को उठाकर अंतिम संस्कार करवाया ,पर उन्होंने किसी भी तरह का ढकोसला करते हुए इस बात को अखबारों में नहीं छपवाया, सोशल मीडिया में नहीं डाला, यह बात जनता को दिखाई दी ,वह मंजर प्रत्यक्ष रूप से मीडिया कर्मियों ने भी देखा है कि जिन लोगों की बात अखबार में की जा रही है इन लोगों ने रात दिन मेहनत कर जेब का  लाखों रुपया खर्च कर लोगों की तीमारदारी की, ऐसे लोगों को छोड़कर , अपने स्वार्थ के लिए परोपकार का ढोंग करने वाले का आभामंडल बनाने वाले दलाल, जो उंगली कटा कर शहीदों में नाम लिखवाने के लिए पूरी व्यवस्था कर रहे है, परंतु कहीं ना कहीं उनका निजी स्वार्थ था, जो अब जनता को भी पता चल चुका है, थानेदार के रहते दलालों की चांदी हुई है इस बात में दो राय नहीं है ऐसे बहुत से प्रमाण मौजूद हैं और तो और जिस प्रकार यह बताया जाता है की कोरोना काल में थानेदार के द्वारा लोगों की मदद की तो हम आपको बता दें इस सिवनी जिले के हर पुलिसकर्मी ने सिवनी जिले के हर उस व्यक्ति ने जिसके अंदर इंसानियत थी उन्होंने यह काम किया है जिसे भुलाया नहीं जा सकता ,कोरोना काल में केवल कोतवाली थानेदार ने ही लोगों की मदद  नही की बल्कि पूरे हिंदुस्तान की पुलिस ने भी वही किया जो कोतवाल ने किया है कोई नया काम नही किया ये निर्देश शाशन का था उसका पालन किया कोई अहसान नागी किया सिवनीं पर,  पुलिस विभाग की ओर से कोरोना काल में मदद करना उनका कर्तव्य था और वह उन्होंने किया क्योंकि देश भक्ति जनसेवा उनका नारा है उस नारे के अंतर्गत काम करना उनकी मजबूरी थी,और उन्होंने काम किया, उसमें कोई नया काम थानेदार ने नहीं किया, हम उन्हें मानते हैं जिन्होंने अपनी जेब का पैसा खर्च कर लोगों की मदद की पर दलाल लोग कभी उनको सम्मानित नहीं कीये, थानेदार को शायद इस बात की जानकारी है या नहीं हमे नही पता परंतु जिस प्रकार थाने से थानेदार  की फोटो सोशल मीडिया पर डालकर एंबुलेंस का प्रचार प्रसार किया गया तो हम बता दें नियम अनुसार थाने से पूरे मध्यप्रदेश में कहीं पर भी एंबुलेंस नहीं चलाई जाती है,पुलिस विभाग में एक एंबुलेंस खड़ी है जो शासन के द्वारा दी गई थी, परंतु नाही उसका सही मेंटेनेंस हो पाया और ना ही काम आ पाई ,अगर थानेदार चाहते तो सरकारी वाहन को ही दुरुस्त कर उसे एंबुलेंस में चलवा सकते थे, अचानक दो एंबुलेंस थाने के अंदर जन सहयोग से लेने की बात की जा रही है तो इसकी जरूरत क्यों पड़ी? दूसरी बात यह है कि एंबुलेंस चलाने के लिए एंबुलेंस का रागिस्ट्रेशन चाहिए होता है जो एंबुलेंस के नाम से रजिस्टर्ड गाड़ियां नहीं है उसे एंबुलेंस में नहीं चलाया जा सकता, परंतु थाने के अंदर से ही ऐसा नियम को तोड़ने वाला काम किया गया है जब एंबुलेंस में मरीज भेजा  जाता है उस वक्त मेडिकल सुपरविजन के लिए डॉक्टर साथ में जाता है परंतु ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी, तो जो भी मरीज एंबुलेंस में भेज गया ,उनके साथ रिस्क लेकर बिना डॉक्टर के भेजा गया ऐसा सूत्र बता रहे हैं तो यह गैरकानूनी तरीका हुआ,  जोकि कोतवाली के परिसर से ही संचालित हुआ, साथ ही निशुल्क एंबुलेंस की बात की गई और सोशल मीडिया में एंबुलेंस का संचालन करने वाले लोगों ने है डाला कि 3000 रु ड्राइवर और एंबुलेंस के डीजल का खर्चा लिया जाएगा तो यह तो धोखाधड़ी हो गई निशुल्क बोलकर मरीज के परिजनों से 3000 रु लिया गया, कुल मिलाकर जहां पर कानून बनाया गया, जहां पर कानून रक्षा करने के लिए वर्दी और वेतन दिया गया ,उसी परिसर से कानून को तोड़कर काम किया गया यह कहां तक सही है, क्या नगर कोतवाल ने नियम को तोड़ कर काम करने वाले लोगों के ऊपर आज तक मामला पंजीबद्ध करते हुए उन्हें जेल भेजा है और अगर नहीं तो फिर कैसी थानेदारी, थानेदार की हिमाकत करने वाले लोगों को एक बार उन लोगों से मुलाकात कर बात करनी चाहिए जिनके साथ घटना घटी और थाने से उन्हें न्याय नहीं मिला दसों बार चक्कर लगाने के बाद उनकी नहीं सुनी गई, आवेदन रखे रखे दीमक चाट गए परंतु कार्यवाही के नाम पर कुछ नहीं हुआ, रसूखदारों के खिलाफ आवाज उठाने पर रसूखदारो को जेल नहीं भेजा गया, जिनके घर में चोरियां हुई पर आज तक समान नही मिला,जिनकी मोटरसाइकिल चोरी गई और अभी तक नही मिली,जिनकी बच्चियों के अश्लील वीडियो बनाए गए पर रसूखदार की औलाद होने पर कार्यवाही नही हुई, जिन बहनों के जमीन के नाम पर धोखाधड़ी की गई पर पैसे ऐंठने वाले पर कार्यवाही नही कि गई,ऐसे सैकड़ों मामले जिसकी मार झेल रहे लोगों से एक बार इन हिमायत करने वालों को पूछना चाहिए कि उनके दिल पर क्या बीत रही है और उनसे पूछो थानेदार साहब का कार्यकाल कितना संतुष्टि पूर्ण रहा, वह बताएंगे थानेदार साहब सिवनी में आए तो सिवनी में मानव सेवा कीये या दलालों को चांदी कटवाए ।

पीड़ित मानव सेवा समिति कोतवाली  लिखवाओ और धड़ल्ले से नियम की धज्जियां उड़ाओ

कोतवाली के थानेदार पुलिसिंग छोड़कर बाकी के हर काम किये, जिसकी आड़ में उन्होंने झूठी व सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश की परंतु दलाल और भाट लोगों से घिरे होने के कारण वह काम सम्मान देने की बजाय बदनामी का रूप ले चुके हैं, हम बात करें की नगर कोतवाल ने पीड़ित मानव सेवा समिति के नाम से एक संस्था को अपने थाना परिसर से संचालित होने दिया ,अब यह समिति कौन संचालित कर रहा था ?इसका रिकॉर्ड  जनता के सामने आज तक नहीं दिया गया है,  सोशल मीडिया पर इससे जुड़े लोगों के फोटो और नाम सहित मोबाइल नंबर प्रदर्शित किए जाते हैं इस समिति के माध्यम से यह दावा किया जाता था इन्होंने निशुल्क एंबुलेंस शुरू किया था पर हम आपको बता दें कि हकीकत क्या है जो सूत्रों के द्वारा जानकारी से यह पता चला है की एक एंबुलेंस नई खरीदी गई थी जिसका  पंजीयन क्रमांक उस एंबुलेंस में नहीं लिखा है और इस एंबुलेंस से शहर के करोड़पति लोगों को अन्य राज्य इलाज के लिए पहुंचाया गया है इसका उल्लेख भी सोशल मीडिया पर मिलता है फिर उस एंबुलेंस का एक्सीडेंट हो जाता है और इस एंबुलेंस के ड्राइवर की मृत्यु हो जाती है मृत्यु के बाद इस एंबुलेंस ड्राइवर के परिवार को 21000 देकर एंबुलेंस की आड़ में समाज सेवा बंद कर दी जाती है पर यहां उल्लेखनीय बात यह है कि एंबुलेंस निशुल्क नहीं इस एंबुलेंस को ले जाने के लिए रुपए 3000 खर्च करने पड़ते थे जोकि मरीज के परिजनों को देना होता था इस बात का उल्लेख भी सोशल मीडिया पर मिलता है वही दूसरी एंबुलेंस जोकि वर्तमान में थाना परिसर में खड़ी है जिसका रजिस्ट्रेशन नंबर एमपी सीसी 65 46 है, जबलपुर की गाड़ी एमपी ट्रांसपोर्ट में दिखाई जा रही है, और गौर करने वाली बात यह है ये प्राइवेट व्हीकल है, एंबुलेंस चलाने की परमिशन नहीं ली गई है,एम्बुलेंस के नाम पर रजिस्टर्ड नही है, महज एंबुलेंस लिखकर इसे गैर कानूनी ढंग से नियमों को ताक पर रखकर थाने से ही 3000 मरीज के परिवार से लेकर मरीज को अन्य अस्पताल पहुंचाया जाता था, अब मानव सेवा के नाम पर अपनी संस्था का नाम लिखते हुए थाना परिसर से पुलिस के नाम पर नियमों को लात मारते हुए कानून का पालन करने वाले अगर एंबुलेंस को चला रहे थे ,वह भी कमर्शियल, तो यह कैसे माना जा सकता है की थानेदार क्राइम रेट कम करने के लिए प्रयाशरत रहे होंगे,जहां कानून व्यवस्था को सुधारने की बात की जाती है जहां कानून पालन करना सिखाया जाता है ,उसी परिसर से नियम कानून को तोड़कर इस एंबुलेंस को संचालित किया गया तो इसके जिम्मेदार लोगों के ऊपर थानेदार ने आज तक मामला दर्ज क्यों नहीं किया? सूत्र बताते है परिसर में खड़ी एंबुलेंस को शहर के एक व्यापारी ने दिया है जो कई बार फड़ में सुर्खियां बटोर चुका है और इस  व्यापारी का इतना दानी रूप भी पहले कभी देखा नही गया और अगर इतना धर्मी होता तो इस एंबुलेंस को अस्पताल में दान कीया होता थाने में दान देने का मतलब साफ है इस व्यापारी की कोई कमजोर नस थानेदार से दबी होगी,नई  एंबुलेंस पूरी तरह खत्म हो चुकी है जिसका एक्सीडेंट हो चुका है जिस एंबुलेंस में ड्राइवर की मृत्यु हो चुकी है उस एंबुलेंस को खरीदने के लिए जिन जिन दानदाताओं ने पैसा दिया उन दानदाताओं की पृष्ठभूमि क्या है? उसे उजागर क्यों नहीं किया गया ?आखिर ऐसे कौन दान दाता है जो थाने में एम्बुलेंस दान कर रहे हैं और थाने में क्यों कर रहे है, जबकि  बहुत सी सामाजिक संस्थाएं और शासकीय संस्थाएं हैं जहां पर एंबुलेंस की आवश्यकता है ,दान तो वहां पर भी दिया जा सकता था, थाने में ही क्यों दिया गया? जबकि थाना ऐसी कोई एजेंसी नहीं है जहां से एंबुलेंस चलाई जाए ,एंबुलेंस अगर दान करनी ही है तो जिला अस्पताल में वैसे भी एंबुलेंस की कमी रहती है, कितने ही परेशान परिजन  अस्पताल परिसर में  एंबुलेंस  की राह ताकते रहते है,जनता को भी सोचना चाहिए कि कहीं निशुल्क एम्बुलेंस और  समाज सेवा की आड़ में बड़ा खेल  तो नही हो रहा और थानेदार और थाने का नाम उपयोग करते हुए कई ऐसे काम हुए हो जिनसे जनता का नही दलाल और भाटो का भला हुआ हो।

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